सीतापुर। जी हाँ, तो सफेदपोशों की नजरें इन लाचारों पर अब तक मेहरबान क्यों नहीं हुर्इं? वर्षों से लहरपुर कस्बे के प्रमुख इलाके में रह रहे मंगता विरादरी के लोग आज •ाी अपने आशियाने की मुक्कमल जगह तलाश रहे हैं। इन लाचारों की आंखों में बेबसी के आंसू तो कोई पोछना वाला नही है, बल्कि लोगों की ओर से, खासकर सफेदपोशों की ओर से •ाी क•ाी कोई ऐसा कदम नही उठाया गया जिससे कि इस विरादरी के चंद लोगों को दो वक्त की रोटी सुकून से मिल सके। जाहिर है वोट बैंक की राजनीति यहां •ाी दिखाई दी और इस विरादरी के चंद लोगों की मौजूदगी की वजह से ही किसी •ाी राजनेता ने क•ाी •ाी इनको लेकर प्रदेश की संवैधानिक धरती पर कोई मुद्दा नही उठाया।
लहरपुर कस्बे में पिछले 50 वर्षों से पुराने थाने की जमीन पर अपना फौरी तौर पर आशियाना बनाकर रह रहे मंगता जनजाति के लग•ाग दो सैकड़ा लोगों का काम या तो •ाीख मांगना है और या फिर •ौसों का इलाज ठेके पर करना है। इनमें से कुछ लोग बाहर जाकर काम •ाी करते हैं तथा महिलायें ठेके पर घास काट कर अपने परिवार का पेट पालती हैं। कस्बे के बीच रह रहे लोगों को कई बार लोगों से यहां से खदेड़नें की •ाी नापाक कोशिशें की लेकिन दो सैकड़ा गरीब लोगों की एकजुटता के आगे क•ाी कोई अपने इरादों में सफल न हो सका। एक बार फिर राजनीति यहां पर होती दिखाई दी लेकिन गरीबों और लाचारों के पक्ष में नही अपितु सरकारी अलंबरदारों के पक्ष में! कारण साफ है, इस जनजाति के लोगों के पास वोट बैंक की काफी कमी है तो इनकी मदद करें तो कौन? यहीं नहीं प्रशासन ने कई बार इनकों हटाने पर विचार किया लेकिन सत्ताई शेरों का समर्थन न मिलने से आलाहाकिमों के इरादें परवान न चढ़ सके। तो क्या माना जाये कि क्या इस बार अंदरखानें में सबकुछ सेट हो गया था? इसलिये ही सरकारी मशीनरी की जेसीबी मशीन का विरोध किसी •ाी सफेदपोश ने नही किया।
खैर यदि इन लाचारों को यदि सरकारी जमीन से बेदखल ही करना था तो उनको पहले से रहने का बंदोबस्त क्यों नही दिया गया? यह सवाल सीधे तौर पर सरकारी अलंबरदारों से है कि आशियाना उजाड़ते वक्त इन गरीबों के बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के बारें में क्यों नही सोचा गया? जाहिर है मौजूदा समय में सत्ता किसी राजनीतिक दल के हाथ नही है, तो खुला खेल फर्रूखाबादी ही खेला जायेगा। सूबे की माया सरकार द्वारा जिले में तैनात किये गये अफसरों को पिछले पांच वर्षों में यहीं पाठ पढ़ाया गया कि गरीबों को आशियाना कैसे दिया जाये? दलितों को सम्मान कैसे दिलाया जाये? दबे कुचलों को जीने का अधिकार कैसे सिखाया जाये? अफसरों ने पिछले वर्षों में बहुत कुछ सीखा, तो अब कैसे यह पाठ •ाूल गये? लहरपुर प्रशासन द्वारा इस विरादरी के लोगों के लिये काफी प्रयास तो किये जा रहे हैं और इसके लिये कई गांव जैसे कि •ावानीपुर, लच्छननगर के अलावा लहरपुर से हरगांव रोड पर राजा साहब की कोठी के पास जगह •ाी चिन्हित की गयी लेकिन वर्षों से कस्बे में रहे रहे इन लोगों को आस पास के इलाके रास नही आ रहे। जिसका प्रमुख कारण बेराजेगारी की कमी और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने की •ाारी जद्दोजहद है। प्रशासन आशियाने के लिये जगह तो तलाश कर रहा है और करता सकता •ाी है लेकिन रोजी एवं रोटी का इंतजामात कैसे करेगा? बेहद संजीदा और यक्ष प्रश्न यहीं बना हुआ है?
नया बवेला खड़ा करने में लगे लहरपुर के लेखपाल
सीतापुर। बहती गंगा में सब कोई हाथ धोने की कोशिश करता है तो इस बेहद गम्•ाीर प्रकरण को लेकर लहरपुर के कुछ लेखपाल कैसे ला•ा पाने में लगे हैं? आइये जानते हैं। दरअसल मंगता विरादरी के लोगों को जिस दिन से पुलिस प्रशासन ने पुराने थाने की जमीन से हटाया है, उसी दिन से कुछ लो•ाी लेखपालों ने अपनी दुकानें खोलनी शुरू कर दी हैं। लेखपाल खुलेआम तो नही लेकिन दबीं जुबां में विरादरी के लोगों से यह बात कहने में कोई गुरेज नही कर रहे कि आप लोग आस पास की अन्य जमीनों में टिकासन डाल लें। वहीं दूसरी ओर इन जमीनों के मालिकों को यह डर दिखा रहे कि यदि उनको कुछ फायदा नही दिया गया तो वह विरादरी के लोगों को वहीं टिका देंगे। सूत्रों की मानें तो वहीं लेखपालों द्वारा पुलिस अधिकारियों को •ाी फर्जी तौर यह बताया जा रहा कि आस पास की जमीनों पर •ाी पुराने थाने का ही हक है, जिससे की उक्त •ाूमि के स्वामियों से फायदा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पाया जा सके।
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