देश में बढ़ने वाली जनसँख्या ने हर उस वस्तु की जरूरत बढाने पर जोर दे दिया, जिसकी वजह से आम आदमी कहीं न कहीं अपने आप को अभागा करार दे देता है........
जनसंख्या बढ़ी तो सरकारों ने खाद्दान की जरुरत को नजरअंदाज नहीं किया और तमाम योजनाये किसानो के लिए सुरु कर दी, जिसके परिणाम भी चौकाने वाले हुए और देश में खाद्दान का मानो भण्डार सा लग गया. उत्तर दिशा से निकलने वाली प्रमुख नदियों की मेहरबानी देश के हर कोने पर बनी रही और सैकड़ों नहरों को जोड़ते हुए नदियों ने अपना दायरा बढ़ा दिया लेकिन समय के बढ़ने के साथ साथ न ही सरकारों द्वारा और न ही किसी व्यक्ति द्वारा कोई आवश्यक कदम उठाये गए जिससे जल के संचयन को बढाया जा सके और आने वाले समय में इससे होने वाली दिक्कतों को आसानी से हल किया जा सके.
कहते है " जल ही जीवन है ", कहने में तो इन शब्दों का बेमोल अर्थ है लेकिन क्या हम उस कदम को उठा रहे है. जिससे इससे होने वाली त्रासदी से निपटा जा सके. हकीकत में अपने आप को ही ठग सा रहे है.