नेताओं एवं अधिकारियों से जितने ज्यादा सम्बंध, उतना बड़ा रसूखदार होगा पत्रकार का कद
सरोकारों को दरकिनार कर बदल रहा पत्रकारिता का स्वरूप
आखिरकार सरोकारों को पत्रकारिता में किस स्तर पर जाकर समझा जाये, इसको समझना भी उतना ही जरूरी है, जितना कि हम आप पत्रकारिता में आना और आकर काम करने को जरूरी समझते हैं। 30 मई का दिन अगले कुछ ही महिनों में आने वाला है, तो जाहिर है इस दिन तमाम शहरों, जिलों और कस्बों तक में पत्रकार गोष्ठियां करेंगे, बैठक करेंगे और कार्यक्रम भी करेंगे। क्योंकि अब तक जो करते रहे हैं। सम्मान कार्यक्रमों के साथ साथ आजादी से पहले और उसके कुछ वर्षों बाद तक के पत्रकारों को याद करेंगे और किसी विशेष अतिथि का भाषण सुनने के बाद फिर से उसी दिशा में जल पड़ेंगे जहां पर बने हुये थे। लेकिन कोई पत्रकार ये क्यों नहीं सोचता कि आने वाले कुछ वर्षों के बाद जब पत्रकारिता दिवस की गोष्ठियां हों तो उनके कारनामों को और कई पत्रकारों के सामने एक मिशाल के रूप में पेश किया जाये। हकीकत में मौजूदा समय में इस ओर किसी भी पत्रकार का ध्यान नहीं जाता है। हकीकत से यदि रुबरू हों तो वर्तमान समय में उस पत्रकार को एक विशेष दर्जा समाज में भी दिया जाने लगा है जो लोगों के सामने अपने रसूख को पेश कर सके।
यानी की बड़े अधिकारियों से जिस पत्रकार से ज्यादातर सम्बंध हों, ज्यादा से ज्यादा नेताओं के पक्ष की खबरें उनको भरष्टाचार की ऊंची उड़ानें भरने में जो मदद करें, वह अपने अखबार में छाप सके और अपने टीवी चैनल पर प्रसारित कर सके। मंहगी से मंहगी गाड़ियों से रिपोर्टिंग करने की अद्भुत क्षमता हो। यानी की हर वो व्यवस्था हो से पत्रकार जुड़ा हो, जो एक हाईटेक पत्रकार में होनी चाहिये। वहीं इन सबके दूसरे पहलू पर गौर करें तो ऐसी व्यवस्थाओं के बीच तमाम वो पत्रकार अपने को पीछे की श्रेणी में मान रहे हैं या यूं कहें कि आगे आने का साहस नहीं दिखा रहे जो इन सुविधाओं से लबरेज नहीं हैं और इन सबके इतर सजग पत्रकारिता करने का साहस व जज्बा रखते हैं। बात हो रही थी पत्रकारिता दिवस की तो मेरा मानना है कि इस दिन से ही पत्रकार एक मंच पर एक साथ आते हैं लेकिन एक पथ पर काम करने की कोई नहीं सोचता।
अक्सर पत्रकारों के बीच होने वाली गाष्ठियां कुछ एक मुद्दों और पुरानी यादों को ताजा करने में ही पूरी हो जाती हैं और प्रबंध तंत्र के दबाव का रोना रो कर पत्रकार अपने आपको पूर्ण ईमानदार होने की मनगंढ़त बातें करतें हैं। लेकिन सवाल सीधा और साफ है कि क्या पत्रकार अपने काम को उचित मानकों से कर रहे हैं। समय के साथ साथ कार्य करने का तरीका तो बदलना ठीक है लेकिन ऐसे बदलने का क्या फायदा जिसमें गुणवत्ता सवालों के घेरों में आ जाये। पिछले कुछ वर्षों से ऐसे कई मामले प्रिंट एवं टीवी पत्रकारिता में देखे गये, जिन्होंने इस कार्य क्षेत्र कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
ऐसे में क्या वाकई सोचने की जरूरत है और अगर है तो कुछ लिखने से पहले मंथन करें कि क्या हम ऐसे कार्य कर रहें हैं जो आने वाले समय में एक मिशाल बनेंगे!!!!!!!!!