Monday, 25 February 2013

मंहगी गाड़ियों पर सवार हैं तो होंगे बड़े पत्रकार!!!!!!!


नेताओं एवं अधिकारियों से जितने ज्यादा सम्बंध, उतना बड़ा रसूखदार होगा पत्रकार का कद

सरोकारों को दरकिनार कर बदल रहा पत्रकारिता का स्वरूप

बात पत्रकारिता की है तो शुरूआत इसके दिवस की तिथि यानी की 30 मई से की जाये तो काफी बेहतर होगा। मै किसी विशेष या बड़े स्तर की पत्रकारिता की ही नहीं इस समुदाय से जुड़े हर उन लोगों के बीच से निकली, उपजी, छनी हुई उन तमाम बातों को यहां रखने की कोशिश कर रहा हूँ, जो कहीं न कहीं सरोकारी पत्रकारिता के सारे मायने को दरकिनार कर चुके हैं।
आखिरकार सरोकारों को पत्रकारिता में किस स्तर पर जाकर समझा जाये, इसको समझना  भी  उतना ही जरूरी है, जितना कि हम आप पत्रकारिता में आना और आकर काम करने को जरूरी समझते हैं। 30 मई का दिन अगले कुछ ही महिनों में आने वाला है, तो जाहिर है इस दिन तमाम शहरों, जिलों और कस्बों तक में पत्रकार गोष्ठियां करेंगे, बैठक करेंगे और कार्यक्रम भी करेंगे। क्योंकि अब तक जो करते रहे हैं। सम्मान कार्यक्रमों के साथ साथ आजादी से पहले और उसके कुछ वर्षों बाद तक के पत्रकारों को याद करेंगे और किसी विशेष अतिथि का भाषण सुनने के बाद फिर से उसी दिशा में जल पड़ेंगे जहां पर बने हुये थे। लेकिन कोई पत्रकार ये क्यों नहीं सोचता कि आने वाले कुछ वर्षों के बाद जब पत्रकारिता दिवस की गोष्ठियां हों तो उनके कारनामों को और कई पत्रकारों के सामने एक मिशाल के रूप में पेश किया जाये। हकीकत में मौजूदा समय में इस ओर किसी भी पत्रकार का ध्यान नहीं जाता है। हकीकत से यदि रुबरू हों तो वर्तमान समय में उस पत्रकार को एक विशेष दर्जा समाज में भी दिया जाने लगा है जो लोगों के सामने अपने रसूख को पेश कर सके।
यानी की बड़े अधिकारियों से जिस पत्रकार से ज्यादातर सम्बंध हों, ज्यादा से ज्यादा नेताओं के पक्ष की खबरें उनको भरष्टाचार की ऊंची उड़ानें भरने में जो मदद करें, वह अपने अखबार में छाप सके और अपने टीवी चैनल पर प्रसारित कर सके। मंहगी से मंहगी गाड़ियों से रिपोर्टिंग करने की अद्भुत क्षमता हो। यानी की हर वो व्यवस्था हो से पत्रकार जुड़ा हो, जो एक हाईटेक पत्रकार में होनी चाहिये। वहीं इन सबके दूसरे पहलू पर गौर करें तो ऐसी व्यवस्थाओं के बीच तमाम वो पत्रकार अपने को पीछे की श्रेणी में मान रहे हैं या यूं कहें कि  आगे आने का साहस नहीं दिखा रहे जो इन सुविधाओं से लबरेज नहीं हैं और इन सबके इतर सजग पत्रकारिता करने का साहस व जज्बा रखते हैं। बात हो रही थी पत्रकारिता दिवस की तो मेरा मानना है कि इस दिन से ही  पत्रकार एक मंच पर एक साथ आते हैं लेकिन एक पथ पर काम करने की कोई नहीं सोचता।
अक्सर पत्रकारों के बीच होने वाली गाष्ठियां कुछ एक मुद्दों और पुरानी यादों को ताजा करने में ही पूरी हो जाती हैं और प्रबंध तंत्र के दबाव का रोना रो कर पत्रकार अपने आपको पूर्ण ईमानदार होने की मनगंढ़त बातें करतें हैं। लेकिन सवाल सीधा और साफ है कि क्या पत्रकार अपने काम को उचित मानकों से कर रहे हैं। समय के साथ साथ कार्य करने का तरीका तो बदलना ठीक है लेकिन ऐसे बदलने का क्या फायदा जिसमें गुणवत्ता सवालों के घेरों में आ जाये। पिछले कुछ वर्षों से ऐसे कई मामले प्रिंट एवं टीवी पत्रकारिता में देखे गये, जिन्होंने इस कार्य क्षेत्र कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।

ऐसे में क्या वाकई सोचने की जरूरत है और अगर है तो कुछ लिखने से पहले मंथन करें कि क्या हम ऐसे कार्य कर रहें हैं जो आने वाले समय में एक मिशाल बनेंगे!!!!!!!!!

Thursday, 22 March 2012

उत्पाती सपाईयों को कैसे काबू करेंगे अखिलेश?

 घोटालों से लेकर बड़ी आपराधिक घटनाओं तक में शामिल रहे सपा विधायक


  ‘लो आया अखिलेश राज’, ‘युवा सीएम के हाथ सूबे की बागडोर’, ‘फुल फ्लैश में मुलायम’ सरीखे शब्दों से नवाजी गयी मौजूदा सपा सरकार और उत्तर प्रदेश के युवा सीएम अखिलेश यादव को शायद इस बात इल्म न होगा कि पूर्व की सपा सरकार में रहे विधायक और सपा के कार्यकर्ताओं द्वारा सीतापुर में ही ऐसे-ऐसे कारनामे किये गये थे, कि उनको याद कर आज •ाी लोग सिहर उठते हैं। सीतापुर में सपा शासन में घोटाले •ाी हुये, •ा्रष्टाचार •ाी हुआ और इतना ही नहीं कई शर्मनाक घटनाओं में •ाी सपा विधायकों ने अपनी अहम •ाूमिका अदा की। फिलहाल इस बार सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ वापसी करते ही सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने साफ तौर पर कह दिया है कि किसी •ाी प्रकार की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जायेगी। तो ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि सीतापुर में समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ‘नेताजी’ के हालिया फरमान के बाद क्या अपना आचरण बदल सकेंगे?
घोटाले- वर्ष 2004 सीतापुर में हुआ खाद्यान्न घोटाला। इस घोटाले की आंच आज •ाी ठण्डी न हो सकी है। यही नहीं सीबीआइ •ाी इस प्रकरण में काफी बड़े पैमानें पर जांच कर चुकी है। फिलहाल घोटाले की तफ्तीश जारी है। कुछ इसी दरमियान बिसवां में आरएफसी वि•ााग के अधिकारियों की मिली•ागत से चावल घोटाला करने की पूरी कोशिश की गई। करोड़ों रुपयों के इस खेल में एक बार तो लगा सबकुछ हजम हो जायेगा लेकिन मीडिया की ताकत एक बार फिर दिखाई दी और तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा सम्बन्धित सपा विधायक के विरुद्ध आरसी जारी कर दी। इसके साथ ही गांजरी क्षेत्र में तो •ा्रष्टाचार की खबरें हमेशा से ही आती रही हैं। गांजर में बाढ़ की वि•ाीषिका का दंश झेल चुके लोगों को सरकारी मद, खासकर विधायक निधि का कोई विशेष सहयोग नहीं मिला है। जाहिर है कहीं न कहीं यहां •ाी सरकारी धन का बंदरबांट हुआ है। इसके अलावा बिसवां में ही देवां मेले में आने वाले मिट्टी के तेल को बेचे जाने का •ाी मामला उस दौरान काफी सुर्खियों में रहा, जिसमें सपा के नेताओं के शामिल होने की बात आई थी।
आपराधिक कृत्य- पूर्व की सपा सरकार में कानून व्यवस्था की लचर स्थिति इस कदर थी कि अपराधियों पर किसी की लगाम तक नही रह गई थी। इसी दौरान ग्राम शंकरपुर झिसनी में एक वि•ात्स हादसा हुआ, जिसमें स्थानीय स्तर पर पुलिस की लापवाही से कईयों की जानें चलीं गई। वहीं उस दौरान कई और मामलों में सपा विधायकों और कार्यकर्ताओं की गुण्डई •ाी देखनें को मिली। लहरपुर में तहसील परिसर में तहसीलदार को एक सपा विधायक द्वारा बेइज्जत किया गया। तो रामपुर मथुरा और रेउसा क्षेत्र के किसी गांव में सरकारी अधिकारियों के साथ रिपोर्टिंग करने गये कुछ पत्रकारों पर जानलेवा हमला किया गया। काफी दबाव के बाद जब पुलिस हरकत में आयी तो सपा के कई विधायकों ने आरोपियों की पैरवी की, जिसका नजारा सीतापुर जनपद में हर किसी ने देखा।
अन्य मामले- सपा के पूर्व के कार्यकाल के दौरान इनके अलावा कई और ऐसे छोटे-छोटे विवाद होते रहे थे, जिससे कानून व्यवस्था तो बिगड़ी ही थी। साथ ही आम जनमानस में काफी दहशत व्याप्त हो गई थी। जिले के स•ाी टैक्सी स्टैण्डों एवं बस स्टैण्डों पर कब्जा करने के मामले में •ाी कई बार सपाई कार्यकताओं द्वारा काफी विवाद किये गये थे। यहां तक की खुलेआम असलहों और रायफलों से फायरिंग तक की जाती रही थी। सपा के कई बड़े नेता और विधायकों के पुत्रों एवं रिश्तेदारों द्वारा •ाी अपने अपने क्षेत्रों में काफी दहशत पूर्व के कार्यकाल के दौरान फैलायी गई थी, जिससे निपटना •ाी युवा सीएम अखिलेश यादव के बड़ी जिम्मेदारी ही होगी।
फिलहाल कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने पर कड़ी कार्रवाई के संकेत तो पहले ही सीएम अखिलेश द्वारा दिये जा चुके थे लेकिन दो दिन पूर्व सपा सुप्रीमों का खुद इस मामलें में कमान सं•ाालना और समाजवादी पार्टी की छवि को लेकर बेहद चिंतित दिखना, इस बात को जाहिर करता है कि पार्टी किसी •ाी हाल में अपनी सियासी जमीन को दागदार, कमजोर और अल्प समयावधि में नहीं बदलने देना चाहती है और इसका सबसे प्रमुख कारण अखिलेश यादव का सियासत में लम्बी पारी खेलने का मन जो है।

Sunday, 18 March 2012

दो लाल बत्तियों के इर्दगिर्द घूमेगा जिला प्रशासन!


कैसे होगा विकास? कैसे बदलेगी तस्वीर?
दो लाल बत्तियों से कितना फायदा पायेगा सीतापुर?

  
सूबे में नई सत्ता के विराजमान होते ही एक बात जो प्रखर होकर हर एक  के बीच जारी है वह यह कि आखिरकार विकास की धारा अब पहले से तेज बहेगी या सिर्फ दावों में ही रह जायेगी। सवाल लाजमी •ाी है और महत्वपूर्ण •ाी, तो इस बड़े प्रश्न का हल आखिरकार कैसे निकलेगा? यह सवाल सिर्फ सूबे का नहीं है बल्कि सवाल हर उस गांव, शहर, कस्बे, व्यक्ति विशेष और समूचे प्रदेश से जुड़ा है जिसको विकास की दरकार है। 
और ऐसे में यदि बात सीतापुर की की जाये तो यहां हर सत्ता शासन के दौरान किसी न किसी राजनेता के पास लाल बत्ती से जुड़ा हुआ रसूख रहता है। जिसकी चकाचौंध में राजनेता अ•ाी तक सिर्फ और सिर्फ दावों तक ही सीमित रह गये हैं। 2012 के विधानस•ाा चुनाव में समाजवादी पार्टी प्रचण्ड बहुमत हासिल कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। सीतापुर से •ाी सपा के सात विधायक बने। जिनमें से नवागत मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दो लोगों को मंत्री पद से नवाजा। पहली सूची में आये सीतापुर  के दो नामों से एक बात तो करीब-करीब साफ हो गयी कि जिले में आने वाली लाल बत्तियां सिर्फ पहली सूची तक सीमित नहीं रहेगी अपितु अगली फेहरिस्तों में •ाी सीतापुर से कई और नाम नवाजे जाने वाले हैं। राजनेता इस उपलब्धी को पाकर गदगद तो हो रहे हैं लेकिन वर्षों से विकास का आश्वासन दे रहे नेताओं के पास अ•ाी तक कोई ऐसा एजेण्डा नहीं है जिसमें लोगों की समस्याओं को निपटाया जा सके, पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सके, बेरोजगारों को रोजगार दिलाया जा सके, वगैरह-वगैरह।
सीतापुर जनपद कई मायनों में बेहद पिछड़ा है, जिसकी जिम्मेदारी आज तलक किसी ने नही ली है। यहां बंद हुई डेढ़ सौ से •ाी अधिक अलग अलग मिलों को दोबारा शुरू कराने की बात तो दूर अन्य चलताऊ मिलों को बंद होने से बचाने की बात •ाी कोई सोच न सका है। यदि अ•ाी तक की स्थितियों पर गौर करें तो प्रदेश सरकार से मिलने वाली लालबत्ती का फायदा आमजन को तो मिल ही नही सका है। इसका फायदा या तो मंत्री जी ने खुद उठाया और या फिर उनके कारिन्दों ने! पिछले कार्यकाल में जिले में एक लालबत्ती थी और इस बार अ•ाी तक पहले से एक बढ़ कर दो हो चुकी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिले में आ चुकी दो लालबत्तियों से सीतापुर जनपद को कितना फायदा होता है।
इनसेट-
एक से निकल दो लाल बत्तियों के घेरे में पहुंचा प्रशासनिक अमला 
सीतापुर। सरकार बसपा की हो या फिर सपा की। एक बात तो तय है कि जिले में वही प्रशासनिक मशीनरी काम करेगी जिसको मंत्रालयों के शूरमा मंत्री जी है चाहेंगे। पूर्व सरकार की बात करें तो बसपा के एकमात्र मंत्री रामहेत •ाारती ही जिले से मंत्री थे, तो इस बार सपा सरकार ने दो को मंत्री पद का दर्जा दिया है। जिनमें एक महमूदाबाद विधायक नरेन्द्र वर्मा और मिश्रिख विधायक रामपाल राजवंशी शामिल हैं। पूर्व में स•ाी ने देखा की किस तरह जिला प्रशासन मंत्री रामहेत •ाारती के इर्द गिर्द घूमता दिखाई दिया, तो माना जाये कि इस बार जिला प्रशासन दो लाल बत्तियों के घेरे में पहुंच गया है।
प्वाइंटर-
सीतापुर जिले की ज्वलंत समस्यायें-
1. सीतापुर शहर के साथ साथ आस पास के कस्बों और ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की समस्या एक बड़ा सवाल बनी हुई है। ज्यादातर नेताओं द्वारा शिक्षा के नाम पर व्यापार करने की होड़ सी बना रखी है, जिसमें आम आदमी पिसता नजर आ रहा है। विद्यार्थियों को दूर दराज के इलाकों से सीतापुर मुख्यालय आना होता है और कई बार तो उनको यहां •ाी कोई विशेष सुविधा नही मिल पाती है।
2. जिले में रोजगार के साधनों में दिन प्रति दिन गिरावट आती रही लेकिन इस ओर किसी •ाी राजनेता ने कोई ध्यान नहीं दिया। जिले में तकरीबन दो सौ से अधिक छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाईयों पर ताला लग गया है। साथ ही मौजूदा वक्त में जो चलताऊ हालत में हैं उनमें से कईयों पर ताला पड़ने की नौबत बनी हुई है। लेकिन सब कुछ सामने होता देख सफेदपोशों ने कोई •ाी कारगर कदम बढ़ाने की जहमत नहीं उठाई। 
3. जिले में बाढ़ की समस्या एक बेहद अहम समस्या है। इस समस्या से ग्रामीण अंचलों में ही नहीं अपितु सीतापुर शहर मुख्यालय पर •ाी खतरे के बादल बरसात के मौसम में मंंडराते दिखाई देते हैं। ग्रामीण इलाकों में तो बाढ़ से हर ओर सिर्फ तबाही ही तबाही दिखाई देती है। जिसपर शासन द्वारा हर वर्ष लाखों रुपये खर्च कर दिये जाने के बावजूद •ाारी मात्रा में धन और संसाधनों का वितरण पीड़ितों में नहीं हो पाता। यानि करोड़ों की निधियों के मालिकों को इन बेबसों की आंखों में क•ाी खौफ का मंजर नहीं आता। 
4. जिले में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर किसी •ाी जिम्मेदार नेता का क•ाी कोई ध्यान नहीं गया है। जिसकी बानगी यह है कि एक अदद कोई मिनी ट्रामा सेंटर •ाी सीतापुर जनपद को मयस्सर नहीं है। जबकि सूबे की राजधानी से यह जिला लग•ाग 100 किमी दूर है। 

Thursday, 15 March 2012

.... तो अब शायद इनका •ाी बदले सूरते हाल!


 
मायावती सरकार में सूबे के अम्बेडकर गांवों का ही विकास प्रमुख रूप से होता रहा। शासन के प्रमुख सचिव की ओर पिछले पांच वर्षों में सूबे के स•ाी मण्डलायुक्तों और जिलाधिकारियों को समय समय पर अम्बेडकर गांवों में विकास कार्य कराये जाने को लेकर निर्देश दिये जाते रहे। लेकिन मौजूदा समय में बदलता आलाहाकिमों का निजाम अब किस करवट बैठेगा? यह तो आना वाला वक्त ही तय करेगा। क्या सपा सरकार में अम्बेडकर गांवों की उपेक्षा होगी, या फिर स•ाी गांवों को एक तरह से तरजीह दी जायेगी। यह बात •ाी देखने वाली होगी।
इतना ही नहीं दलितों के •ाारी वोट बैंक पर एकाधिकार बनाये रखने के लिये बहुजन समाज पार्टी ने कई हथकण्डों के अपनाने के साथ साथ सरकारी कामों से •ाी फायदा पाने में कोई कसर नही छोड़ी और शासन स्तर से खासकर बडेÞ अधिकारियों को जिलों के अम्बेडकर गांवों का निरीक्षण करने के लिये अचानक •ोजा जाता रहा। जाहिर है बसपा सरकार दलितों में यह संदेश देना चाहती रही कि उनकी पार्टी से ज्यादा हिमायती उनके लिये और कोई दल नहीं है। फिलहाल आज शपथ ग्रहण समारोह सपा के युवराज अखिलेश यादव का यूपी के सीएम के तौर पर होने जा रहा है तो ऐसे में अब अम्बेडकर गांवों के अलावा, या यूँ कहें कि अन्य गांवों को •ाी सपा सरकार से विकास की दरबार हो गयी है।
यदि हाल ही के कुछ चौंकानें वाले आंकड़ों पर गौर करें तो वाकई यह साफ हो जायेगा कि किस तरह विकास के नाम पर खजाना खाली होने का रोना रोने वाली बसपा सरकार ने जिलों के अम्बेडकर गांवों पर करोड़ों रुपया महज वोटों को पाने के लिये खर्च किया। प्रदेश •ार के अम्बेडकर गांवों के लिये खोला गया माया सरकार द्वारा खजाना कितना कारगर यहा, यह तो सबने देखा लेकिन इस तरह की कार्यशैली ने बसपा राज पर एक तरह से सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। यदि बात सीतापुर जिले की ही की जाये तो वर्ष 2011-12 में ही जिले के 119 गांवों का चयन अम्बेडकर ग्राम स•ाा विकास योजना के लिये किया गया था। इन गांवों पर 37087.85 लाख रुपया खर्च किया गया। यह तो महज एक जिले के एक वर्ष का आंकड़ा है, यदि इस तरह से प्रदेश के स•ाी जिलों के पांच वर्षों की तस्वीर देखीं जायें तो यह साफ हो जायेगा कि बसपा सरकार ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में किस तरह करोड़ों रुपया अन्य सैकड़ों गांवों की उपेक्षा कर चंद गांवों पर ही खर्च किया।

‘हाथीराज’ में कुचले गये शहरी मोहल्ले


जिस तरह मायावती सरकार में ग्राम स•ााओं में चिन्हित किये गये कुछ गांवों में अम्बेडकर ग्राम विकास योजना के अर्न्तगत करोड़ों रुपया खर्च किया गया, कुछ उसी तरह प्रदेश के लग•ाग हर एक जिला मुख्यालय पर •ाी बसपाईयों ने वोटों की रोटियां सेंकनें में कोई कसर नही छोड़ी। हर एक जिला मुख्यालय पर शहरी क्षेत्रों में एक मोहल्ले  जिसमें दलितों की संख्या सर्वाधिक रही और उस मोहल्ले  में काफी बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कराया गया। शहर के मोहल्लों में जिन अधिकारियों ने क•ाी न पहुंच कर न ही गलियों की सड़कों का निरीक्षण किया और न तो साफ सफाई एवं पेयजल की व्यवस्था पर कोई ध्यान दिया। वही अध्किारी शहरों अम्बेडकर मोहल्ले और मलिन बस्तियों में बेहद सजग रहे और हर निर्माण एवं विकास कार्य को काफी एहतिहातन कराया।
यदि सीधे तौर पर यह कहा जाये कि पूर्व के बसपा शासन यानी की हाथीराज में शहरों के अधिकांश मोहल्लों को दबाया गया, कुचला गया। यदि शहरों के किसी मोहल्ले में विकास हुआ तो अम्बेडकर मोहल्लों के रूप में चिन्हित मलिन बस्तियों के इलाकों में! यदि आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश के कुल 58 जिलों में लग•ाग एक अरब पांच करोड़ का काम महज कुछ महिनों में कराया गया। लिहाजा बसपा सरकार नें दलितों को एकजुट करने में कोई कसर नही छोड़ी और विधानस•ाा चुनावों से पूर्व ही दिसम्बर 2011 माह तक जैसे तैसे मलिन बस्तियों में काम पूरा करा दिया गया। मा. श्री कांशीराम जी शहरी गरीब दलित बाहुल्य बस्ती समग्र विकास योजना के अर्न्तगत जो विकास कार्य कराये गये उनमें पेयजल एवं सीवर व्यवस्था, जल निकासी की व्यवस्था, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था, सम्पर्क मार्गों का निर्माण, सीसी रोड एवं दोनों ओर बंद नाली का निर्माण, विद्युतीकरण एवं स्ट्रीट लाइटें की व्यवस्था, प्राथमिक विद्यालय, गरीबों के लिये आवासीय सुविधा, सामुदायिक केन्द्रों का निर्माण, पार्कों का सौन्दर्यीकरण आदि योजनाआें का निर्माण कार्य कराया गया।
शासन द्वारा जारी किये गये शासनदेश से सिर्फ शहरों के अम्बेडकर मोहल्लों के रूप में चिन्हित इलाकों में निर्माण कार्य इस योजना के तहत हुआ तो अन्य मोहल्ले उपेक्षा का शिकार रहे। ऐसे में अन्य मोहल्लों में रहने वाले लोगों को खास तौर पर इस उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है, वहीं बसपा सरकार को इस करतब से अपनी पैठ और मजबूत होती दिखाई दी। बसपा शासन का ही यह दबाव था कि अम्बेडकर मोहल्लों में निर्माण कार्य को लेकर जिले के लग•ाग स•ाी वि•ाागों के अधिकारी बेहद चौकन्नें दिखाई दिये। आरईएस से लगाकर, डूडा तक व पालिका से लगाकर नलकूप तक हर एक वि•ााग का अधिकारी दिसम्बर माह के दौरान अम्बेडकर मोहल्ले का ही निरीक्षण करता दिखाई दिया। यदि सीतापुर शहर की बात की जाये तो 2011-12 की इस योजना के लिये जिले से शासन को शहर के अम्बेडकर मोहल्ले के लिये 2.83 करोड़ का बजट पास करके •ोजा था, जिस पर शासन द्वारा महज 2 करोड़ के कुल बजट पर ही मोहर लगायी गयी। जिसके अर्न्तगत कार्य •ाी काफी संतोष जनक नही हुआ है।

आलाहाकिम बदलते ही बदलेगी जिले के प्रशासनिक महकमें की सूरत


नये सीएम के रूप में आज शपथ लेंगे अखिलेश, तो अफसरान शुरू करेंगे परेड
एसडीएम व तहीलदार स्तर के अधिकारियों समेत पुलिस अधिकारियों का •ाी होगा तबादला
वर्षों से टिके वि•ाागों में कर्मचारियों पर •ाी गिर सकती है गाज, होगा बड़े पैमाने पर बदलाव

जी हाँ, तो सूबे में तैनात हर छोटा बड़ा अफसरान परेड शुरू करने की तैयारी करने लगा है। जिसका कारण कोई और नही आज होने वाले नये सीएम का शपथ ग्रहण समारोह जो है। खासतौर पर उन अधिकारियों को डर सताने लगा है जो बसपा नेताओं के खासमखास सिपहसालार रहे हैं। ऐसे में जाहिर है जब आलाहाकिमों में बदलाव होगा तो निजाम की •ाी तस्वीर बदलेगी। 
अब जरा सोचिये की यदि एक ओर से जिलों में अधिकारियों का बदलाव होगा तो सूरतेहाल कैसा होगा? यदि सूत्रों से मिल रही खबरों पर गौर करें तो प्रदेश को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ानें का संकल्प ले चुके सं•ाावित मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का प्रमुख एजेण्डा यूपी से •ा्रष्टाचार, घोटालेबाजों की फौज को क्लीन शेव करने का होगा। साथ ही उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर •ाी खास नजर होगी, जिन्होंने अ•ाी तक बसपा के एजेण्ट के तौर पर काम किया है। यहीं नहीं वि•ाागों में जिस किसी खास वजहों से किसी खास वर्ग के जिन लोगों को कर्मचारियों के तौर पर अ•ाी तक प्रमुखता दी गयी थी, उनको •ाी टारगेट पर रखा जायेगा। 
बात यदि सीतापुर जनपद की कि जाये तो यहां के हालात •ाी अ•ाी से बेहद गम्•ाीर दिखाई देने लगे हैं। पूर्व में काफी समय तक बसपाई राग अलाप चुके कर्मचारियों पर सपाईयों की टेढ़ी नजरें बनी हुयी हैं। जिसमें कई प्रशासनिक अधिकारियोें समेत तहसीलदार, वि•ाागों के कर्मचारी तो शामिल ही हैं, साथ ही कई पुलिस अधिकारियों और दारोगाओं नाम •ाी सुर्खियों में शुमार हो चुके हैं। यहीं नहीं बसपा शासन में बसपाईयों का चरण वंदन करने वाले वे कर्मचारी जो कि वर्षों से एक ही पद पर एक ही वि•ााग में टिके हुये हैं, उनमें •ाी बड़े पैमानें पर बदलाव की सं•ाावनायें जोर पकड़नें लगी हैं। मसलन, काफी कुछ बदलने वाला है लेकिन अब देखने वाली बात यह है इतना सब बदलने के साथ साथ सूबे की सूरत में किस तरह का बदलाव होगा?

सपा सरकार से अन्य गांवों को विकास की दरकार सपा सरकार से अन्य गांवों को विकास की दरकार सपा सरकार से अन्य गांवों को विकास की दरकार


.... तो अब शायद इनका •ाी बदले सूरते हाल!
बसपा शासन में अम्बेडकर गांवों पर हुआ करोड़ों रुपयों का खर्च
2011-12 वर्ष में जिले के 119 अम्बेडकर गांवों पर 37088 लाख रुपया खर्च किया गया



मायावती सरकार में सूबे के अम्बेडकर गांवों का ही विकास प्रमुख रूप से होता रहा। शासन के प्रमुख सचिव की ओर पिछले पांच वर्षों में सूबे के स•ाी मण्डलायुक्तों और जिलाधिकारियों को समय समय पर अम्बेडकर गांवों में विकास कार्य कराये जाने को लेकर निर्देश दिये जाते रहे। लेकिन मौजूदा समय में बदलता आलाहाकिमों का निजाम अब किस करवट बैठेगा? यह तो आना वाला वक्त ही तय करेगा। क्या सपा सरकार में अम्बेडकर गांवों की उपेक्षा होगी, या फिर स•ाी गांवों को एक तरह से तरजीह दी जायेगी। यह बात •ाी देखने वाली होगी।
इतना ही नहीं दलितों के •ाारी वोट बैंक पर एकाधिकार बनाये रखने के लिये बहुजन समाज पार्टी ने कई हथकण्डों के अपनाने के साथ साथ सरकारी कामों से •ाी फायदा पाने में कोई कसर नही छोड़ी और शासन स्तर से खासकर बडेÞ अधिकारियों को जिलों के अम्बेडकर गांवों का निरीक्षण करने के लिये अचानक •ोजा जाता रहा। जाहिर है बसपा सरकार दलितों में यह संदेश देना चाहती रही कि उनकी पार्टी से ज्यादा हिमायती उनके लिये और कोई दल नहीं है। फिलहाल आज शपथ ग्रहण समारोह सपा के युवराज अखिलेश यादव का यूपी के सीएम के तौर पर होने जा रहा है तो ऐसे में अब अम्बेडकर गांवों के अलावा, या यूँ कहें कि अन्य गांवों को •ाी सपा सरकार से विकास की दरबार हो गयी है।
यदि हाल ही के कुछ चौंकानें वाले आंकड़ों पर गौर करें तो वाकई यह साफ हो जायेगा कि किस तरह विकास के नाम पर खजाना खाली होने का रोना रोने वाली बसपा सरकार ने जिलों के अम्बेडकर गांवों पर करोड़ों रुपया महज वोटों को पाने के लिये खर्च किया। प्रदेश •ार के अम्बेडकर गांवों के लिये खोला गया माया सरकार द्वारा खजाना कितना कारगर यहा, यह तो सबने देखा लेकिन इस तरह की कार्यशैली ने बसपा राज पर एक तरह से सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। यदि बात सीतापुर जिले की ही की जाये तो वर्ष 2011-12 में ही जिले के 119 गांवों का चयन अम्बेडकर ग्राम स•ाा विकास योजना के लिये किया गया था। इन गांवों पर 37087.85 लाख रुपया खर्च किया गया। यह तो महज एक जिले के एक वर्ष का आंकड़ा है, यदि इस तरह से प्रदेश के स•ाी जिलों के पांच वर्षों की तस्वीर देखीं जायें तो यह साफ हो जायेगा कि बसपा सरकार ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में किस तरह करोड़ों रुपया अन्य सैकड़ों गांवों की उपेक्षा कर चंद गांवों पर ही खर्च किया।
प्वांइटर
1. 2011-12 में जिले की 119 ग्राम स•ााओं में 1091.09 लाख रुपयों के शौंचालयों का निर्माण कार्य हुआ
2. इसी तरह इस एक वर्ष में 361.41 किलोमीटर मिट्टी का काम अम्बेडकर गांवों में कराया गया और 212 किलोमीटर लेपन का कार्य हुआ। जिस पर तकरीबन 9526.64 लाख रुपया खर्च हुआ।
3. इसी तरह सीसी रोड के काम पर 13932.79 लाख रुपया खर्च किया गया।
4. वहीं केसी डेÑन के काम पर 7278.93 लाख रुपया खर्च किया गया।
5. अम्बेडकर गांवों में विद्युतीकरण के काम पर 1483.50 लाख रुपया खर्च किया गया।
6. गांवों में हैण्डपम्प लगवाने के नाम पर 116.85 लाख रुपया खर्च किया गया।
7. अम्बेडकर गांवों में आवासहीनों को आवास आवंटन किये जाने के नाम पर कुल 3658.05 लाख रुपया खर्च किया गया।