Thursday, 15 March 2012

.... तो अब शायद इनका •ाी बदले सूरते हाल!


 
मायावती सरकार में सूबे के अम्बेडकर गांवों का ही विकास प्रमुख रूप से होता रहा। शासन के प्रमुख सचिव की ओर पिछले पांच वर्षों में सूबे के स•ाी मण्डलायुक्तों और जिलाधिकारियों को समय समय पर अम्बेडकर गांवों में विकास कार्य कराये जाने को लेकर निर्देश दिये जाते रहे। लेकिन मौजूदा समय में बदलता आलाहाकिमों का निजाम अब किस करवट बैठेगा? यह तो आना वाला वक्त ही तय करेगा। क्या सपा सरकार में अम्बेडकर गांवों की उपेक्षा होगी, या फिर स•ाी गांवों को एक तरह से तरजीह दी जायेगी। यह बात •ाी देखने वाली होगी।
इतना ही नहीं दलितों के •ाारी वोट बैंक पर एकाधिकार बनाये रखने के लिये बहुजन समाज पार्टी ने कई हथकण्डों के अपनाने के साथ साथ सरकारी कामों से •ाी फायदा पाने में कोई कसर नही छोड़ी और शासन स्तर से खासकर बडेÞ अधिकारियों को जिलों के अम्बेडकर गांवों का निरीक्षण करने के लिये अचानक •ोजा जाता रहा। जाहिर है बसपा सरकार दलितों में यह संदेश देना चाहती रही कि उनकी पार्टी से ज्यादा हिमायती उनके लिये और कोई दल नहीं है। फिलहाल आज शपथ ग्रहण समारोह सपा के युवराज अखिलेश यादव का यूपी के सीएम के तौर पर होने जा रहा है तो ऐसे में अब अम्बेडकर गांवों के अलावा, या यूँ कहें कि अन्य गांवों को •ाी सपा सरकार से विकास की दरबार हो गयी है।
यदि हाल ही के कुछ चौंकानें वाले आंकड़ों पर गौर करें तो वाकई यह साफ हो जायेगा कि किस तरह विकास के नाम पर खजाना खाली होने का रोना रोने वाली बसपा सरकार ने जिलों के अम्बेडकर गांवों पर करोड़ों रुपया महज वोटों को पाने के लिये खर्च किया। प्रदेश •ार के अम्बेडकर गांवों के लिये खोला गया माया सरकार द्वारा खजाना कितना कारगर यहा, यह तो सबने देखा लेकिन इस तरह की कार्यशैली ने बसपा राज पर एक तरह से सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। यदि बात सीतापुर जिले की ही की जाये तो वर्ष 2011-12 में ही जिले के 119 गांवों का चयन अम्बेडकर ग्राम स•ाा विकास योजना के लिये किया गया था। इन गांवों पर 37087.85 लाख रुपया खर्च किया गया। यह तो महज एक जिले के एक वर्ष का आंकड़ा है, यदि इस तरह से प्रदेश के स•ाी जिलों के पांच वर्षों की तस्वीर देखीं जायें तो यह साफ हो जायेगा कि बसपा सरकार ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में किस तरह करोड़ों रुपया अन्य सैकड़ों गांवों की उपेक्षा कर चंद गांवों पर ही खर्च किया।

‘हाथीराज’ में कुचले गये शहरी मोहल्ले


जिस तरह मायावती सरकार में ग्राम स•ााओं में चिन्हित किये गये कुछ गांवों में अम्बेडकर ग्राम विकास योजना के अर्न्तगत करोड़ों रुपया खर्च किया गया, कुछ उसी तरह प्रदेश के लग•ाग हर एक जिला मुख्यालय पर •ाी बसपाईयों ने वोटों की रोटियां सेंकनें में कोई कसर नही छोड़ी। हर एक जिला मुख्यालय पर शहरी क्षेत्रों में एक मोहल्ले  जिसमें दलितों की संख्या सर्वाधिक रही और उस मोहल्ले  में काफी बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कराया गया। शहर के मोहल्लों में जिन अधिकारियों ने क•ाी न पहुंच कर न ही गलियों की सड़कों का निरीक्षण किया और न तो साफ सफाई एवं पेयजल की व्यवस्था पर कोई ध्यान दिया। वही अध्किारी शहरों अम्बेडकर मोहल्ले और मलिन बस्तियों में बेहद सजग रहे और हर निर्माण एवं विकास कार्य को काफी एहतिहातन कराया।
यदि सीधे तौर पर यह कहा जाये कि पूर्व के बसपा शासन यानी की हाथीराज में शहरों के अधिकांश मोहल्लों को दबाया गया, कुचला गया। यदि शहरों के किसी मोहल्ले में विकास हुआ तो अम्बेडकर मोहल्लों के रूप में चिन्हित मलिन बस्तियों के इलाकों में! यदि आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश के कुल 58 जिलों में लग•ाग एक अरब पांच करोड़ का काम महज कुछ महिनों में कराया गया। लिहाजा बसपा सरकार नें दलितों को एकजुट करने में कोई कसर नही छोड़ी और विधानस•ाा चुनावों से पूर्व ही दिसम्बर 2011 माह तक जैसे तैसे मलिन बस्तियों में काम पूरा करा दिया गया। मा. श्री कांशीराम जी शहरी गरीब दलित बाहुल्य बस्ती समग्र विकास योजना के अर्न्तगत जो विकास कार्य कराये गये उनमें पेयजल एवं सीवर व्यवस्था, जल निकासी की व्यवस्था, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था, सम्पर्क मार्गों का निर्माण, सीसी रोड एवं दोनों ओर बंद नाली का निर्माण, विद्युतीकरण एवं स्ट्रीट लाइटें की व्यवस्था, प्राथमिक विद्यालय, गरीबों के लिये आवासीय सुविधा, सामुदायिक केन्द्रों का निर्माण, पार्कों का सौन्दर्यीकरण आदि योजनाआें का निर्माण कार्य कराया गया।
शासन द्वारा जारी किये गये शासनदेश से सिर्फ शहरों के अम्बेडकर मोहल्लों के रूप में चिन्हित इलाकों में निर्माण कार्य इस योजना के तहत हुआ तो अन्य मोहल्ले उपेक्षा का शिकार रहे। ऐसे में अन्य मोहल्लों में रहने वाले लोगों को खास तौर पर इस उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है, वहीं बसपा सरकार को इस करतब से अपनी पैठ और मजबूत होती दिखाई दी। बसपा शासन का ही यह दबाव था कि अम्बेडकर मोहल्लों में निर्माण कार्य को लेकर जिले के लग•ाग स•ाी वि•ाागों के अधिकारी बेहद चौकन्नें दिखाई दिये। आरईएस से लगाकर, डूडा तक व पालिका से लगाकर नलकूप तक हर एक वि•ााग का अधिकारी दिसम्बर माह के दौरान अम्बेडकर मोहल्ले का ही निरीक्षण करता दिखाई दिया। यदि सीतापुर शहर की बात की जाये तो 2011-12 की इस योजना के लिये जिले से शासन को शहर के अम्बेडकर मोहल्ले के लिये 2.83 करोड़ का बजट पास करके •ोजा था, जिस पर शासन द्वारा महज 2 करोड़ के कुल बजट पर ही मोहर लगायी गयी। जिसके अर्न्तगत कार्य •ाी काफी संतोष जनक नही हुआ है।

आलाहाकिम बदलते ही बदलेगी जिले के प्रशासनिक महकमें की सूरत


नये सीएम के रूप में आज शपथ लेंगे अखिलेश, तो अफसरान शुरू करेंगे परेड
एसडीएम व तहीलदार स्तर के अधिकारियों समेत पुलिस अधिकारियों का •ाी होगा तबादला
वर्षों से टिके वि•ाागों में कर्मचारियों पर •ाी गिर सकती है गाज, होगा बड़े पैमाने पर बदलाव

जी हाँ, तो सूबे में तैनात हर छोटा बड़ा अफसरान परेड शुरू करने की तैयारी करने लगा है। जिसका कारण कोई और नही आज होने वाले नये सीएम का शपथ ग्रहण समारोह जो है। खासतौर पर उन अधिकारियों को डर सताने लगा है जो बसपा नेताओं के खासमखास सिपहसालार रहे हैं। ऐसे में जाहिर है जब आलाहाकिमों में बदलाव होगा तो निजाम की •ाी तस्वीर बदलेगी। 
अब जरा सोचिये की यदि एक ओर से जिलों में अधिकारियों का बदलाव होगा तो सूरतेहाल कैसा होगा? यदि सूत्रों से मिल रही खबरों पर गौर करें तो प्रदेश को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ानें का संकल्प ले चुके सं•ाावित मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का प्रमुख एजेण्डा यूपी से •ा्रष्टाचार, घोटालेबाजों की फौज को क्लीन शेव करने का होगा। साथ ही उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर •ाी खास नजर होगी, जिन्होंने अ•ाी तक बसपा के एजेण्ट के तौर पर काम किया है। यहीं नहीं वि•ाागों में जिस किसी खास वजहों से किसी खास वर्ग के जिन लोगों को कर्मचारियों के तौर पर अ•ाी तक प्रमुखता दी गयी थी, उनको •ाी टारगेट पर रखा जायेगा। 
बात यदि सीतापुर जनपद की कि जाये तो यहां के हालात •ाी अ•ाी से बेहद गम्•ाीर दिखाई देने लगे हैं। पूर्व में काफी समय तक बसपाई राग अलाप चुके कर्मचारियों पर सपाईयों की टेढ़ी नजरें बनी हुयी हैं। जिसमें कई प्रशासनिक अधिकारियोें समेत तहसीलदार, वि•ाागों के कर्मचारी तो शामिल ही हैं, साथ ही कई पुलिस अधिकारियों और दारोगाओं नाम •ाी सुर्खियों में शुमार हो चुके हैं। यहीं नहीं बसपा शासन में बसपाईयों का चरण वंदन करने वाले वे कर्मचारी जो कि वर्षों से एक ही पद पर एक ही वि•ााग में टिके हुये हैं, उनमें •ाी बड़े पैमानें पर बदलाव की सं•ाावनायें जोर पकड़नें लगी हैं। मसलन, काफी कुछ बदलने वाला है लेकिन अब देखने वाली बात यह है इतना सब बदलने के साथ साथ सूबे की सूरत में किस तरह का बदलाव होगा?

सपा सरकार से अन्य गांवों को विकास की दरकार सपा सरकार से अन्य गांवों को विकास की दरकार सपा सरकार से अन्य गांवों को विकास की दरकार


.... तो अब शायद इनका •ाी बदले सूरते हाल!
बसपा शासन में अम्बेडकर गांवों पर हुआ करोड़ों रुपयों का खर्च
2011-12 वर्ष में जिले के 119 अम्बेडकर गांवों पर 37088 लाख रुपया खर्च किया गया



मायावती सरकार में सूबे के अम्बेडकर गांवों का ही विकास प्रमुख रूप से होता रहा। शासन के प्रमुख सचिव की ओर पिछले पांच वर्षों में सूबे के स•ाी मण्डलायुक्तों और जिलाधिकारियों को समय समय पर अम्बेडकर गांवों में विकास कार्य कराये जाने को लेकर निर्देश दिये जाते रहे। लेकिन मौजूदा समय में बदलता आलाहाकिमों का निजाम अब किस करवट बैठेगा? यह तो आना वाला वक्त ही तय करेगा। क्या सपा सरकार में अम्बेडकर गांवों की उपेक्षा होगी, या फिर स•ाी गांवों को एक तरह से तरजीह दी जायेगी। यह बात •ाी देखने वाली होगी।
इतना ही नहीं दलितों के •ाारी वोट बैंक पर एकाधिकार बनाये रखने के लिये बहुजन समाज पार्टी ने कई हथकण्डों के अपनाने के साथ साथ सरकारी कामों से •ाी फायदा पाने में कोई कसर नही छोड़ी और शासन स्तर से खासकर बडेÞ अधिकारियों को जिलों के अम्बेडकर गांवों का निरीक्षण करने के लिये अचानक •ोजा जाता रहा। जाहिर है बसपा सरकार दलितों में यह संदेश देना चाहती रही कि उनकी पार्टी से ज्यादा हिमायती उनके लिये और कोई दल नहीं है। फिलहाल आज शपथ ग्रहण समारोह सपा के युवराज अखिलेश यादव का यूपी के सीएम के तौर पर होने जा रहा है तो ऐसे में अब अम्बेडकर गांवों के अलावा, या यूँ कहें कि अन्य गांवों को •ाी सपा सरकार से विकास की दरबार हो गयी है।
यदि हाल ही के कुछ चौंकानें वाले आंकड़ों पर गौर करें तो वाकई यह साफ हो जायेगा कि किस तरह विकास के नाम पर खजाना खाली होने का रोना रोने वाली बसपा सरकार ने जिलों के अम्बेडकर गांवों पर करोड़ों रुपया महज वोटों को पाने के लिये खर्च किया। प्रदेश •ार के अम्बेडकर गांवों के लिये खोला गया माया सरकार द्वारा खजाना कितना कारगर यहा, यह तो सबने देखा लेकिन इस तरह की कार्यशैली ने बसपा राज पर एक तरह से सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। यदि बात सीतापुर जिले की ही की जाये तो वर्ष 2011-12 में ही जिले के 119 गांवों का चयन अम्बेडकर ग्राम स•ाा विकास योजना के लिये किया गया था। इन गांवों पर 37087.85 लाख रुपया खर्च किया गया। यह तो महज एक जिले के एक वर्ष का आंकड़ा है, यदि इस तरह से प्रदेश के स•ाी जिलों के पांच वर्षों की तस्वीर देखीं जायें तो यह साफ हो जायेगा कि बसपा सरकार ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में किस तरह करोड़ों रुपया अन्य सैकड़ों गांवों की उपेक्षा कर चंद गांवों पर ही खर्च किया।
प्वांइटर
1. 2011-12 में जिले की 119 ग्राम स•ााओं में 1091.09 लाख रुपयों के शौंचालयों का निर्माण कार्य हुआ
2. इसी तरह इस एक वर्ष में 361.41 किलोमीटर मिट्टी का काम अम्बेडकर गांवों में कराया गया और 212 किलोमीटर लेपन का कार्य हुआ। जिस पर तकरीबन 9526.64 लाख रुपया खर्च हुआ।
3. इसी तरह सीसी रोड के काम पर 13932.79 लाख रुपया खर्च किया गया।
4. वहीं केसी डेÑन के काम पर 7278.93 लाख रुपया खर्च किया गया।
5. अम्बेडकर गांवों में विद्युतीकरण के काम पर 1483.50 लाख रुपया खर्च किया गया।
6. गांवों में हैण्डपम्प लगवाने के नाम पर 116.85 लाख रुपया खर्च किया गया।
7. अम्बेडकर गांवों में आवासहीनों को आवास आवंटन किये जाने के नाम पर कुल 3658.05 लाख रुपया खर्च किया गया।


Sunday, 11 March 2012

साजिशों और उपद्रव के बीच फंसी सपा की साख


इसे साजिशों का परिणाम कहें या फिर फुल-फ्लैश में आयी सपा की सरकार से नशे में चूर सपाईयों का रसूख लेकिन इतना तो साफ है कि परिणाम आने के बाद चार दिनों के •ाीतर ही जिले में पांच ऐसे मामले हुये जिससे जनपद का लॉ-एण्ड-आॅर्डर सिस्टम पूरी तरह फेल हो गया। ज्यादातर जगह पर दलितों को निशाना बनाया गया तो विपक्षियों ने इसका ठीकरा समाजवादी पार्टी के समर्थकों पर फोड़नें में देरी नहीं की। लिहाजा जनता का केन्द्र बिन्दु बन चुकी सपा सरकार अब अपनी साख बचाने में लग गयी है।
पूरे प्रदेश में 6 मार्च को 2012 विधानस•ाा चुनाव के परिणाम आ गये और समाजवादी पार्टी की अन्दू्रहनी लहर के आगे अन्य स•ाी पार्टियां धराशायी हो गयीं। एक ओर जहां समाजवादी पार्टी द्वारा सत्ता में उनकी वापसी के बाद प्रदेश में अमन चैन रहने की बात को प्रमुखता से कहा गया, वहीं अन्य दलों ने एक बार फिर प्रदेश में गुण्डाराज होने की बात दोहरायी और कहीं न कहीं विपक्षियों की आशंकायें प्रदेश में सच साबित होती दिखाई दे रही हैं। ऐसे में यदि सीतापुर की बात करें तो परिणाम आने के अगले दिन यानी की सात मार्च से ही जिले में बवालों का दौर शुरू हो गया। एक बार तो लगा कि सीतापुर में अराजक तत्वों का बोलबाला हो गया है। 7 मार्च तकरीबन रात 9 बजे होली से ठीक एक दिन पूर्व जिले के रेउसा थाना क्षेत्र में दबंगों ने दलितों के कई छप्पर फूंक डाले। इस घटना में कई लोग बुरी तरह से जख्मी हो गये। काफी दबाव के बाद पुलिस ने दबंगों पर मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तारी की। इस मामले में सपा विधायक महेन्द्र सिंह झीनू बाबू के समर्थकों के जुड़े होने की बात प्रमुख रूप से आयी। रेउसा की इस घटना के बाद तो मानों घटनाओं की बाढ़ सी आ गयी।
अगले ही दिन मिश्रिख में चुनावी रंजिश के मद्देनजर दलित की हत्या कर दी गई। इस प्रकरण में सपा विधायक रामपाल राजवंशी के समर्थकों के जुड़े होने की खबरें आयीं। तो एक बार तो पुलिस प्रशासन हतप्र•ा दिखाई दिया। उधर संदना में सपा बसपा समर्थकों में काफी विवाद हुआ और •िाडंÞत हो गई।  काफी मशक्कत के बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा, तब कहीं जाकर विवाद सुलझता हुआ दिखाई दिया। वहीं महोली में चुनावी रंजिश की एक और घटना सामने आयी। यहां सपा एवं बसपा के समर्थकों के बीच फायरिंग हुई। पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर एक की गिरफ्तारी •ाी की है। इसके अलावा शनिवार का दिन पूरा होते होते एक और घटना ने पूरे के पूरे सिस्टम को हिला सा रख दिया। इस दिन मिश्रिख में चुनावी रंजिश के कारण एक की हत्या किये जाने का कुत्सित प्रयास किया गया। यहां से मिल रही छबरों पर गौर करें तो इस घटना में •ाी सपा विधायक रामपाल राजवंशी के समर्थकों की पूरी •ाागीदारी रही है। कुल मिलाकर •ायमुक्त वातावरण का सपना दिखा रहे •ाावी युवा सीएम अखिलेश यादव के लिये जनपदों में शांति व्यवस्था बनाये रखने की एक बड़ी जिम्मेदारी पद पर बैठनें से पहले ही आ गयी है।

Friday, 9 March 2012

सत्ता की साइकिल पर सवार सपाई खरे उतरेंगे, एक बड़ा सवाल?


तमाम जानकारों और रणनीतिकारों की अटकलों पर विराम लगाते हुये जिले ही नही बल्कि प्रदेश की जनता ने समाजवादी पार्टी को प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता के मुहाने तक बैठा दिया है और अब अगले कुछ दिनों में कुछ औपचारिकताओं को पूरा कर नेताजी प्रदेश का सीएम पद•ाार चौथी बार सं•ाालेंगे। जाहिर है, ऐसे में जनता को अब बहुत सी उम्मीदें सपा सरकार से हैं और बात यदि सीतापुर कि की जाये तो जिले से विधानस•ाा पहुंचनें वाले सात सपा विधायकों से जिले के लोग अब जिले की तस्वीर बदलने की उम्मीद लगाने लगे हैं। पूर्व के कार्यकालों को पूरा करने वाले सपा विधायकों से लोग उम्मीद के साथ साथ उन पर एक सवाल •ाी करने लगे हैं कि क्या वह इस कार्यकाल में उनकी उम्मीदों पर खरा उतर सकेंगे?
दरअसल सीतापुर जिले को विकास की बेहद आवश्यक्ता है। जिस तरह अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी ने पार्टी के मैनीफेस्टो के हर एक बिन्दु का प्रचार अपने चुनावी अ•िायान में किया, उससे पार्टी की दोबारा पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी होने से जिम्मेदारी बढ़ गयी है। बेरोजगारी •ात्ते से लेकर कन्या विद्या धन दिये जाने की बात हो या फिर गम्•ाीर बीमारियां जिसमें लीवर, कैंसर, किडनी आदि आते हैं का मुफ्त इलाज होने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी को गरीबों के हितों के लिये कई ऐसे काम और करने होंगे जिससे वह अब तक की सरकारों से महरूम रहे हैं। अखिलेश यादव द्वारा शुरू की गई रथ यात्रा जब सीतापुर पहुंची तो इस दौरान सीतापुर में बंद चीनी मिलों को शुरू कराने और बुनकरों के लिये विशेष योजनायें लागू किये जाने की बात पुरजोर तरह से उनके द्वारा कही गयी। साथ ही अखिलेश ने मीटिंगों के दौरान बेरोगारों के लिये रोजगार उपलब्ध कराये जाने की बात •ाी कही। जनसंदेश टाइम्स पहले •ाी कई बड़े मुद्दे उठा चुका है, जिसमें शहर के अन्दर वर्षों से लंबित एक पुल, लड़कियों के लिये पुराने सीतापुर में एक डिग्री कॉलेज, चिकित्सीय व्यवस्था में वृहद स्तर पर सुधार किये जाने की बात को प्रमुख रूप दिया गया था। इसी तरह गांजरी इलाकों में बाढ़ की बड़ी समस्या से निपटने के लिये •ाी सपा सरकार को कारगर उपाय करने होगे, जिससे लाखों प्र•ाावित लोगों को राहत मिल सके।
लेकिन एक बात से •ाी इंकार किया जाना मुश्किल है कि जिले में पूर्व से रहे सपा के कई विधायकों में काम के नाम पर कोई विशेष कार्य नही किये हैं। उनके क्षेत्रों में आज •ाी लोगों को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। फिर चाहे शिक्षा की समस्या हो या, विकास की दरकार और या फिर रोजगार के साधन पूर्व की बसपा सरकार पर ठीकरा फोड़नें वाले सपा विधायकों को अपने इस कार्यकाल में अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा, शायद त•ाी प्रदेश के युवा हीरो अखिलेश यादव द्वारा देखा गया नये समाजवाद का सपना पूरा हो सकेगा। गौरतलब है कि नये समाजवाद में अखिलेश ने जिस सपनें को देखा है, उसमें विकास युक्त, •ायमुक्त और अपराध मुक्त शासन की परिकल्पा प्रमुख रूप से है।

Saturday, 3 March 2012

.... तो इन पर मेहरबानी आखिर क्यों नहीं सफेदपोश की?


 सीतापुर। जी हाँ, तो सफेदपोशों की नजरें इन लाचारों पर अब तक मेहरबान क्यों नहीं हुर्इं? वर्षों से लहरपुर कस्बे के प्रमुख इलाके में रह रहे मंगता विरादरी के लोग आज •ाी अपने आशियाने की मुक्कमल जगह तलाश रहे हैं। इन लाचारों की आंखों में बेबसी के आंसू तो कोई पोछना वाला नही है, बल्कि लोगों की ओर से, खासकर सफेदपोशों की ओर से •ाी क•ाी कोई ऐसा कदम नही उठाया गया जिससे कि इस विरादरी के चंद लोगों को दो वक्त की रोटी सुकून से मिल सके। जाहिर है वोट बैंक की राजनीति यहां •ाी दिखाई दी और इस विरादरी के चंद लोगों की मौजूदगी की वजह से ही किसी •ाी राजनेता ने क•ाी •ाी इनको लेकर प्रदेश की संवैधानिक धरती पर कोई मुद्दा नही उठाया।
लहरपुर कस्बे में पिछले 50 वर्षों से पुराने थाने की जमीन पर अपना फौरी तौर पर आशियाना बनाकर रह रहे मंगता जनजाति के लग•ाग दो सैकड़ा लोगों का काम या तो •ाीख मांगना है और या फिर •ौसों का इलाज ठेके पर करना है। इनमें से कुछ लोग बाहर जाकर काम •ाी करते हैं तथा महिलायें ठेके पर घास काट कर अपने परिवार का पेट पालती हैं। कस्बे के बीच रह रहे लोगों को कई बार लोगों से यहां से खदेड़नें की •ाी नापाक कोशिशें की लेकिन दो सैकड़ा गरीब लोगों की एकजुटता के आगे क•ाी कोई अपने इरादों में सफल न हो सका। एक बार फिर राजनीति यहां पर होती दिखाई दी लेकिन गरीबों और लाचारों के पक्ष में नही अपितु सरकारी अलंबरदारों के पक्ष में! कारण साफ है, इस जनजाति के लोगों के पास वोट बैंक की काफी कमी है तो इनकी मदद करें तो कौन? यहीं नहीं प्रशासन ने कई बार इनकों हटाने पर विचार किया लेकिन सत्ताई शेरों का समर्थन न मिलने से आलाहाकिमों के इरादें परवान न चढ़ सके। तो क्या माना जाये कि क्या इस बार अंदरखानें में सबकुछ सेट हो गया था? इसलिये ही सरकारी मशीनरी की जेसीबी मशीन का विरोध किसी •ाी सफेदपोश ने नही किया।
खैर यदि इन लाचारों को यदि सरकारी जमीन से बेदखल ही करना था तो उनको पहले से रहने का बंदोबस्त क्यों नही दिया गया? यह सवाल सीधे तौर पर सरकारी अलंबरदारों से है कि आशियाना उजाड़ते वक्त इन गरीबों के बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के बारें में क्यों नही सोचा गया? जाहिर है मौजूदा समय में सत्ता किसी राजनीतिक दल के हाथ नही है, तो खुला खेल फर्रूखाबादी ही खेला जायेगा। सूबे की माया सरकार द्वारा जिले में तैनात किये गये अफसरों को पिछले पांच वर्षों में यहीं पाठ पढ़ाया गया कि गरीबों को आशियाना कैसे दिया जाये? दलितों को सम्मान कैसे दिलाया जाये? दबे कुचलों को जीने का अधिकार कैसे सिखाया जाये? अफसरों ने पिछले वर्षों में बहुत कुछ सीखा, तो अब कैसे यह पाठ •ाूल गये? लहरपुर प्रशासन द्वारा इस विरादरी के लोगों के लिये काफी प्रयास तो किये जा रहे हैं और इसके लिये कई गांव जैसे कि •ावानीपुर, लच्छननगर के अलावा लहरपुर से हरगांव रोड पर राजा साहब की कोठी के पास जगह •ाी चिन्हित की गयी लेकिन वर्षों से कस्बे में रहे रहे इन लोगों को आस पास के इलाके रास नही आ रहे। जिसका प्रमुख कारण बेराजेगारी की कमी और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने की •ाारी जद्दोजहद है। प्रशासन आशियाने के लिये जगह तो तलाश कर रहा है और करता सकता •ाी है लेकिन रोजी एवं रोटी का इंतजामात कैसे करेगा? बेहद संजीदा और यक्ष प्रश्न यहीं बना हुआ है?
नया बवेला खड़ा करने में लगे लहरपुर के लेखपाल
सीतापुर। बहती गंगा में सब कोई हाथ धोने की कोशिश करता है तो इस बेहद गम्•ाीर प्रकरण को लेकर लहरपुर के कुछ लेखपाल कैसे ला•ा पाने में लगे हैं? आइये जानते हैं। दरअसल मंगता विरादरी के लोगों को जिस दिन से पुलिस प्रशासन ने पुराने थाने की जमीन से हटाया है, उसी दिन से कुछ लो•ाी लेखपालों ने अपनी दुकानें खोलनी शुरू कर दी हैं। लेखपाल खुलेआम तो नही लेकिन दबीं जुबां में विरादरी के लोगों से यह बात कहने में कोई गुरेज नही कर रहे कि आप लोग आस पास की अन्य जमीनों में टिकासन डाल लें। वहीं दूसरी ओर इन जमीनों के मालिकों को यह डर दिखा रहे कि यदि उनको कुछ फायदा नही दिया गया तो वह विरादरी के लोगों को वहीं टिका देंगे। सूत्रों की मानें तो वहीं लेखपालों द्वारा पुलिस अधिकारियों को •ाी फर्जी तौर यह बताया जा रहा कि आस पास की जमीनों पर •ाी पुराने थाने का ही हक है, जिससे की उक्त •ाूमि के स्वामियों से फायदा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पाया जा सके।